Swati Kumar's Blogs

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a really warm welcome to my world of words, my emotions.

Sep 7, 2007

भीड़ जलती है !

मैं घर लौटते हुए,

तेज़ क़दमों से चलती हूँ,

लगे नही ठोकर,

थोडा बच के निकलती हु.
वो पान वाले के खडे होने का अंदाज़,

कभी लोगो के ठीठकने का मिजाज़,

कभी सोचती हूँ, के चलते चलते क्यों रूक गया कोई,

फिर अगली सोच पर उस ख़याल को झिड़कती हु.
कोई नारियल पानी बेचता,

किसी ने छतरी बनाने को खोली दुकान,

कोई किताबों की नकली कॉपियाँ बेचता

कोई फलों की टोकरी से खीचे मेरा ध्यान.
घर लौटने की है जल्दी,

के घर लॉट कर आराम फरमाना है,

शायद देख डालू कोई फिल्म,

और फिर खाना भी पकाना है.
आह, के मुह पर आया मेरे ढ़ेर सा धुआं,

cigarette लेकर चल रह था कोई वह,

नाक बंद कर के मैं आगे निकलती हु,

cigarette के धुए में जलती भीड़ को देखती हु.
जलाता कोई एक है, पीती पुरी भीड़ है,

एक एक सिगरेट की वजह से हर पल जलती वो भीड़ है.
भीड़ की कोई जुबां नही,

ना है भीड़ की कोई कान,

मगर ऐसे ही कुछ एक के हाथों

जलना ही शायद इसकी तकदीर है.
यह भीड़, ह गूंगी भीड़

रौंदती कुचलती बस चलती भीड़,

राह चलते मैं भी इसका ही हिस्सा हु,

और उसकी तरह एक बेनाम किस्सा हूँ.
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Yes, I hate smokers around, specially those who puff boldly in the middle of the road. They simply don't care about the passers by and simply puff their cigarette. Sometimes I simply make a comment and mostly I move on with my palm on my nose... and feel suffocated with the idea of remaining silent.

Those spitters on road, those footpath smokers, fail to realise their contribution to the society!!

2 comments:

Avanish Gautam said...

सबसे पहले आपकी प्रतिक्रिया का धन्यवाद!

आप मुझसे कभी भी बात कर सकती हैं. स्वागत है आपका. आप मुझे gtalk में add कर सकतीं है. avanishgautam@gmail.com से.
आपकी कविताएं तफ्सील से पढ कर अपने विचार दुंगा. एक बार फिर से धन्यवाद.

Imran Jalandhari said...

very-very great.......
keep it up

take care
bye