Swati Kumar's Blogs

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a really warm welcome to my world of words, my emotions.

Mar 24, 2008

Insaan Hone ki Khwaish Liye





मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ

यह दुनिया देखा-भला है
जब से होश संभाला है
लोग यहा पैदा होकर
किसी मज़हब में बट जाते हैं
थोड़े और बड़े होकर
जातियों की लकीरों से कट जाते हैं

इंसानियत यहाँ कुछ नही
बस ऊची होती दीवार ही नज़र आती है

लोगो ने भगवान् के नाम पर
भीड़ के कई हिस्से किए
फिर जातियों की चादर तले
कोने कोने के भी छोटे हिस्से किए

यह हमारा , वह तुम्हारा
हर तरफ़ यही नारा है
के इंसान ने इंसान होने का
कोई फ़र्ज़ कहा उतारा है

एक बच्चा था मैं
न हिंदू न मुस्लमान
..
और आज बड़े होकर मैं
गया अपने मज़हब को पहचान.

छोटा था अग्यान था
इस दुनिया में फैले जाल से;
और आज मैं डरता रहता हूँ
समाज में छुपे भूचाल से

मुझे मिल जाए वो भगवान्
मैं येही कहना चाहता हूँ
के धर्म के नाम पर बटती इस दुनिया में
मैं सिर्फ़ एक इंसान ही रहना चाहता हूँ.



Entry for February 25, 2008

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