Swati Kumar's Blogs

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a really warm welcome to my world of words, my emotions.

Jul 2, 2011

Fir ho rahi hai Barish

बारिश में भीगते पत्ते,
भीग कर भी नहीं भीगते,
और उन पर पड़ती बूंद
रही हलके हलके फिसलते;
कुछ पत्तो पर पड़ती बूंद लगती है जैसे मोती ,
कुछ बुँदे यु चुपचाप है जैसे हो रोती ...
बारिश की बुँदे ज़मीन पर उतर कर समा जाती है,
अपना आसमानी अस्तित्व भी मिटाकर समा जाती है
उसमे बर्फ सा गुरुर कहा जो ज़मीन पर आकर भी
अपनी सफेदी से सब कुछ ढक देता हो ....
बुँदे टिप टिप बरसती, अपने ही ठण्ड में ठिठुरती ...
टीन  की छत पर पड़ती, मुडती , घुमड़ती
मेरे आँगन में आई है ...
चंचल है यु जैसे शोखी में नहाई है ...
मैं भीगना चाहती हु...
उन बूंदों सा होना चाहती हु
लेकिन शायद मैं बूंदों की तरह अपने आप को खो नहीं पाऊँगी ....
सब कुछ अपने रंग में रंगकर, बर्फ सा हो जाउंगी.
 

4 comments:

raul said...

good poem,
beautiful bhav !! :)

raul said...

nice poem.
very beautiful bhav !!
jo mitne ki ichchha hai woh kisi aur jagat ka bualava hai .

PinX said...

Shukriya :)

Prameela said...

aah! i think i lost your blog somehow...and old comment reconnected me to it........
lovely poem btw :)